इंडियन रिवाइज्ड वर्जन (IRV) हिंदी - 2019
1 कुरिन्थियों 13
प्रेम महान है
यदि मैं मनुष्यों, और स्वर्गदूतों की बोलियाँ बोलूँ, और प्रेम न रखूँ, तो मैं ठनठनाता हुआ पीतल, और झंझनाती हुई झाँझ हूँ। और यदि मैं भविष्यद्वाणी कर सकूँ, और सब भेदों और सब प्रकार के ज्ञान को समझूँ, और मुझे यहाँ तक पूरा विश्वास हो, कि मैं पहाड़ों को हटा दूँ, परन्तु प्रेम न रखूँ, तो मैं कुछ भी नहीं1। और यदि मैं अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति कंगालों को खिला दूँ, या अपनी देह जलाने के लिये दे दूँ, और प्रेम न रखूँ, तो मुझे कुछ भी लाभ नहीं।
प्रेम धीरजवन्त है, और कृपालु है; प्रेम डाह नहीं करता; प्रेम अपनी बड़ाई नहीं करता, और फूलता नहीं। अशोभनीय व्यवहार नहीं करता, वह अपनी भलाई नहीं चाहता, झुँझलाता नहीं, बुरा नहीं मानता। कुकर्म से आनन्दित नहीं होता, परन्तु सत्य से आनन्दित होता है। वह सब बातें सह लेता है, सब बातों पर विश्वास करता है, सब बातों की आशा रखता है2, सब बातों में धीरज धरता है। (1 कुरि. 13:4)
प्रेम कभी टलता नहीं; भविष्यद्वाणियाँ हों, तो समाप्त हो जाएँगी, भाषाएँ मौन हो जाएँगी; ज्ञान हो, तो मिट जाएगा। क्योंकि हमारा ज्ञान अधूरा है, और हमारी भविष्यद्वाणी अधूरी। परन्तु जब सर्वसिद्ध3 आएगा, तो अधूरा मिट जाएगा। जब मैं बालक था, तो मैं बालकों के समान बोलता था, बालकों के समान मन था बालकों सी समझ थी; परन्तु सयाना हो गया, तो बालकों की बातें छोड़ दीं। अब हमें दर्पण में धुँधला सा दिखाई देता है; परन्तु उस समय आमने-सामने देखेंगे, इस समय मेरा ज्ञान अधूरा है; परन्तु उस समय ऐसी पूरी रीति से पहचानूँगा, जैसा मैं पहचाना गया हूँ। पर अब विश्वास, आशा, प्रेम ये तीनों स्थायी4 हैं, पर इनमें सबसे बड़ा प्रेम है।
Source notes (4)
- Footnote मैं कुछ भी नहीं: इन सभी का कोई मूल्य नहीं होगा। यह मुझे उद्धार नहीं देगा।
- Footnote सब बातों की आशा रखता है: आशा जो सब बातों को अच्छाई में बदल देगा।
- Footnote सर्वसिद्ध: इसका मतलब यह है कि जब कोई वह चीज जो उत्तम दिखती है या आनन्द लिया जाता है, तब वह जो उत्तम नहीं है भूला दिया जाता हैं।
- Footnote स्थायी: यह “नित्यता” को दर्शाता है, जब अन्य सब बातें समाप्त हो जाएँगी, विश्वास, आशा, और प्रेम “स्थायी” रहेंगे।
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